राजनीति पर राजनीति
मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं कवि दुष्यंत की यह पंक्तियाँ आज हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक हैं जो अपने सदियों पुराने आत्म गौरव का लबादा ओढ़े घूम रहा है। अपनी खूबी पर फ़क़्र करना गुनाह नहीं पर खामियों की पैमाना भी देखते चलना चाहिए। 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2013 से आज तक प्रतिवर्ष 12,000 किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं। एक कृषि प्रधान देश के लिए इस रिपोर्ट के बाद भी संज्ञाशून्यता स्तब्ध कर देती है। 200 देशों के ह्यूमन डेवलेपमेंट इंडेक्स में भारत अभी 131 वें स्थान पर ही पहुँच सका है। भारत की गिनती एक निर्धन और पिछड़े लोगों का मुल्क में होती है। सरकारी शिक्षा के चीथड़े अति निम्न वर्गीय बच्चों से लेकर सुशिक्षित बेरोजगारों के साथ क्रूर मज़ाक बन कर समाज में उड़ रहे हैं। नारी को दुर्गा मानने वाला देश कभी कभी तो आठ महीने की बच्ची को भी दुष्कर्मी से बचा नहीं पाता। साथ ही किसी वयस्क लड़की साथ यदि इस तरह का कुछ घटित हो जाय तो समाज के तथाकथित संभ्रांत उटपटांग बयानबाजियों की होड़ मचा देते हैं। राम की सत्यनिष्ठा, कृष्ण की न्या...