संघ का स्वातंत्र्य आंदोलनो मे योगदान- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की भूमिका विशेष
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भारतीय मनीषा के लिए एक अबूझ पहेली के रूप मे लिया जाता है जबकि सघं के पास छिपाने के लिए कुछ नही है। संघ संस्थापक डॉ0 हेडगेवार को लेकर प्रश्नावलियां की बौछार करने को उद्वेलित व उलझी मानसिकता के लोग तैयार रहते हैं पर उनको इस बात का भान नहीं कि जन मूल्यों के लिए यदि 21 वीं शताब्दी का दुनिया का सबसे बडा संगठन माना जायेगा तो आर.एस.एस.ही माना जायेगा। आजकल एक विशेष परिचर्चा चल रही है कि आखिर संघ का स्ंवतत्रता प्राप्ति में योगदान क्या रहा है?
संघ का स्वातंत्र्य आंदोलनो मे योगदान के लेकर अक्सर प्रश्न उठाये जाते हैं। संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार का स्वातंत्र्य आंदोलन के लिए अ्रग्रेजो से लड़ाई मे योगदान गाधी, नेहरू सहित कई बडे नेताओ से अधिक त्यागमय था। इतिहासकारां ने संघ के योगदान को छिपाया है। डॉ हेडगेवार से लेकर वर्तमान सर संघ चालक मोहन भागवत तक के संघर्ष को तत्कालीन परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में लिया जा सकता है। डॉ. हेडगेवार जी ने16 वर्ष की आयु मे युवावर्ग में राष्ट्रीय घटनाओं पर चर्चा और क्रान्तिकारी गुणां के विकास के लिए ‘‘देशवन्धु समाज‘‘ की शुरूआत 1901 में की थी।
(1) डॉ. हेडगेवार ने इस संगठन मे शामिल होने के लिए शर्त रखी थी कि हर युवा को प्रतिज्ञा करनी होगी कि वह अपना शरीर और आत्मा मातृभूमि के सेवा में अर्पित करता है।
(2) उनको स्कूल में अंग्रेज अफसर के निरीक्षण के समय‘‘वन्देमातरम्‘‘ के नारे लगवाने तथा नागपुर के मॉरिस कालेज सहित दो हजार छात्रां की हड़ताल कराने और भरी सभा में अंग्रेजों से माफी मांगने से इन्कार करने पर सर रेजिलेण्ड क्रडोक के निर्देश पर पुलिस महानिरीक्षक सीआर क्लीवलैण्ड की अनुशंसा पर निष्कासित कर दिया गया।
(3) डॉ. हेडगेवार ने सन् 1908 मे रामपायली में पुलिस चौकीपर बम फेंका। यह बम निकट के तालब पर फटा। पुलिस के पास कोई सबूत नहीं था इसलिए गिरफ्तारी से बच गये।रामपायली में ही 1908 मे अक्टूबर महीने में रावण दहन के दशहरा के कार्यक्रम मे देशभक्तिपूर्ण जोशीला भाषण दिया और पूरी भीड़ वन्देमातरम् से पूरा माहौल गूंज उठा। इस पर डॉ. हेडगेवार पर अंग्रेजो ने आईपीसी की धारा 108 के तहत राजद्रोही भाषण करने पर केस दर्ज किया।
(4) डॉ. हेडगेवार 1909 मे यवतमाल आ गय।े यहां भी उन्होनें बॉधव समाज की स्थापना की। उन्होने वहॉ भी चौकी पर बम फेंका। इसके खिलाफ पुलिस के पास कोई सबूत नही होने के नाते कार्यवाही से बच गये लेकिन उनके विद्यालय को 1908 के अधिनियम 16 के तहत गैरकानूनी करार दे कर बन्द करा दिया।
(5) क्रांतिकारी संगठन ‘‘अनुशीलन समिति‘‘ में डॉ. हेडगेवार को उनकी देशभक्ति एवं संघर्ष को देखते हुए स्थान दिया गया।
(6) क्रांतिकारियों में डॉ. हेडगेवार को ‘‘ कोकेन‘‘ के नाम से जाना जाता था और उनके शस्त्र का छद्म नाम ‘‘ एनाटोमी‘‘ था। क्रांतिकारियों में उनका बडा सम्मान था।
(7) प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्याम सुन्दर चक्रवर्ती की पुत्री के विवाह मे लोक सहायता और मौलवी लियाकत हुसेन फेज कैप कि जगह उन्हांने गांधी टोपी पहना जो उनके चरित्र को दर्शाता है।
(8) डॉ. हेडगेवार का परिचय रासबिहारी बोस, विपिन-चन्द्रपाल से था। उन्हांने अपने कार्य एवं व्यवहार से क्रांतिकारियों का दिल जीत लिया।
(9) वे बंगाल और मध्यप्रान्त के क्रांतिकारियों के बीच की कड़ी थे। वे नागपुर मे छिपाकर शस्त्र लाया करते थे।(10) राष्ट्रीय मेडिकल कालेजां के छात्रों की क्रांतिकारी भूमिका के कारण जब उनकी डिग्री अमान्य कर दी गई तो नागपुर में डॉ. हेडगेवार ने इस बिल के विरोध मे प्रस्ताव पारित कराया जिससे अंग्रेजों को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा।
(11) उन्होनें प्रथम विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजी सेना में भारतीय युवकां की भर्ती का विरोध किया और जनता में जागरण भी किया।
(12) डॉ. हेडगेवार ने नागपुर और वर्धा में सक्रिय क्रांतिकारी दल के सक्रिय सदस्य के रूप मे भी काम किया।
(13) डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्र के प्रति प्रेम के कारण डॉक्ट्रेट की डिग्री हासिल करने और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति मे होने पर भी प्रैक्टिस और नौकरी भी छोड दी।
(14) जब देश में असहयोग आंदोलन चल रहा था तो कांग्रेस की नागपुर आंदोलन समिति में डॉ. हेडगेवार भी उसमे शामिल थे। 11 नवम्बर 1920 से एक सप्ताह तक असहयोग सप्ताह के रूप में आंदोलन आयोजित किया और सरकार के राजस्व को खत्म करने के लिए नशाबन्दी आंदोलन चलाया।
(15) इन पर आमसभाआें मे भाग लेने पर अंग्रेजी कोर्ट के निर्देश पर जिला अधीक्षक जेम्स इरविन के साइन से नोटिस दिया गया जिसका इन्होने खुला उल्लंघन किया।
(16) अक्टूबर 1920मे डॉ. हेडगेवार पर काटोल और भारत वाड़ा कि सभाओ में अंग्रेज विरोधी ओजस्वी भाषणां और 1908 में तेज उग्र लेखन को लेकर आईपीसी धारा 108 के अर्न्तगत मई 1921 में राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।डॉ. हेडगेवार ने योजनापूर्वक अपनी पैरवी स्वयं की। उन्हें एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।
(17) डॉ. हेडगेवार ने जेल में भी अनेक कष्ट झेलते हुए हिन्दू धर्म की जागृति की। गीता, महाभारत का पाठ बंदी साथियों को सुनाने और जालियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में हड़ताल की। वे 11 जुलाई 1922 को जेल से रिहा हुए।
(18)डॉ हेडगेवार ने जेल से बाहर आकर ‘‘स्वातंत्र्य‘‘ नामक समाचार पत्र का सम्पादन किया और अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पत्र की पाठक संख्या 1200 हो गयी। डॉ हेडगेवार को पूर्ण स्वतंत्रता की मांग, साइमन कमीशन का विरोध करने मे, गिरफ्तार कर आईपीसी की धारा 117 के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया और फिर से 9 महीने के सश्रम कारावास की सजा हुई। वे 14 फरवरी 1931 को जेल से रिहा हुए। डॉ हेडगेवार ने भावनगर सत्याग्रह,रामसेना, जैसे विवादों का सामना किया। आरएसएस की स्थापना 1925 मे की। संघ को मिले समर्थन को देखकर सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस की शाखा में जाने पर अंग्रेजो ने रोक लगा दी।
(19) भारत में अंग्रेजी सरकार के सचिव एम जी हैलेट ने 27 जनवरी 1933 को आरएसएस के बारे में जानकारी लेने एवम गतिविधियों को रोकने के निर्देश दिए ओर डॉ हेडगेवार को संघ का हिटलर कहां
(20) 20 दिसम्बर 1933 को अंग्रेजी मध्य भारत के स्थानीय स्वशासन विभाग ने नोटिस जारी कर संघ के कार्यक्रमां को रोकने की कार्यवाही की। डॉ हेडगेवार जी के नेतृत्व में संघ के सामाजिक कार्यो से प्रेरित होकर संघ के समर्थन में नागपुर नगर पालिका ने 10 मार्च 1921 को समर्थन भी पारित किया। नागपुर में 30 दिसम्बर 1938 को संघ के कार्यक्रम में 15000 से अधिक लोग उपस्थित थे।
(21) अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारी राजगुरू को भूमिगत रहने एवम अन्य सहायता प्रदान की ।
(22) संघ के एक सैनिक संगठन की तरह प्रशिक्षण देने से अंग्रेज चिंतित थे।
(23) इनके साथी अंग्रेजो के विरूध गुप्त रूप से अन्य क्रांतिकारी कार्य भी कर रहे थे। बाला साहब देवरस का नाम इसमें लिया जा सकता है।
(24) संघ की आत्मा ‘‘शाखा‘‘ है। संघ की रचनात्मक व्यवस्था क्रमशः- केन्द्र क्षेत्र,प्रान्त,विभाग ,जिला,तालुका,नगर,मण्डल,शाखा के रूप में संचालित होती है। किसी मैदान या सार्वजनिक स्थान पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिए स्वयंसेवको का एकत्रीकरण होता है। इसे शाखा कहते हैं। शाखा में प्रार्थना, योग-व्यायाम, खेल और गीत जैसे रोचक माध्यमों की बडी भूमिका होती है जो स्वयंसेवको के अंतः करण में अनुशासन, आज्ञापालन,राष्ट्रभक्ति, नेतृत्व कौशल व समर्पण जैसे जीवन मूल्यां को सिंचित व पोषित करता है।
शाखा मे कार्यवाह का पद सबसे बडा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए मुख्य शिक्षक का पद होता है। जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है वह ‘‘स्वयंसेवक‘‘ कहलाता है। व्यवस्था की दृष्टि से शाखाओं के भी कुछ प्रकार हैं- प्रभात शाखा, सांय शाखा, रात्रि शाखा,। इसके अतिरिक्त जो स्वयंसेवक प्रतिदिन नही आ पाते उनके लिए सप्ताह में एक या दो बार शाखा लगती है इसे ‘मिलन‘ कहते है। इसी तरह महीने में एक या दो बार लगनेवाली शाखा को एकत्रीकरण कहते है। वस्तुतः शाखा ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव है। संघ के ज्यादातर कार्यो का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है। वर्तमान में सम्पूर्ण देश में कुल 33000 स्थानों पर संघ की कुल एक लाख शाखाएं दैनिक रूप से लगती हैं। संघ की शाखा ने ही संघ को शक्तिसंपन्न बनाया,इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि शाखा ही संघ-शक्ति का मूल है। जबतक शाखा चलती रहेगी स्वयंसेवको की संख्या बढती रहेगी और स्वयंसेवको के गुणो मे श्रीवृद्वि होगी।
तथ्यगत अध्ययन से स्पष्ट है कि संघ एवं डॉ हेडगेवार की भूमिका स्वतंत्रता संग्राम मे यथेष्ट रही है। अब सोचना होगा ही कि अनर्गल प्रलाप या दोषारोपण करने के पहले हर कोई उनकी महान सेवा एवं राष्ट्रीय सोच को सम्मान दे जिसके फलस्वरूप आज देश के शीर्षस्त पदो पर संघ के स्वयंसेवक और संघ के राष्ट्रीय विचार धारा के हिमायती पदस्त हो कर मातृभूमि की सेवा कर रहे है। आइये, जन-जन मे पूजनीय हेडगेवार और आरएसएस के योगदान की चर्चा करते रहें............ नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे..........।
स्वाधीनता पूर्व जिन संगठनो ने काग्रेस लर विचार करे राष्ट्रीय परिदेश में रखना शुरू करके उसमे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा केवट राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का नाम शीर्ष पर स्वतः जाता है यहा 1925 का संदर्भ लिया जाना ही होगा इसी वर्ष कम्पुनिया पार्टी का भी गठन हुआ था परन्तु राष्ट्रीय अथवा भारतीय वा संदर्भ को ध्यान मे रखा जाए तो समानान्तर अध्ययन नही किया जा सकता है हरते हास सेव स्वतः रगींत करवा है कि कांग्रेस के साथ चलने वाले तथा उनसे साथ मुस्लिम हित पोषक संगठन से भी राष्ट्रीय स्यंव सेवक संघ की तुलना या होने के बवजूद बधक चर्चा नही की जा सकती है यह आपकी प्रेत नही होने के बवजूद कि राष्ट्रीय हित चिनन मे जाति या सम्प्रदाय सेवक तथ्या एवं तहवा महत्व दिशा नाय या नही भारतीय हिन्दू एवं हिन्दू फार्गी केता से ओतप्रोत राष्ट्रीय चिनान मे राष्ट्रीय स्यंव सेवक संघ का अपना एवं स्यंव असातित्व रहा है कौर इसके प्रेरणा स्त्रोत महा मानव डा0 केशन बतिराम डेडगेवर रहे एवं जो स्यंव विदेश की राजनीति से जुडे है।
आखिर संघ के मूल मे एसी कौन सी शक्ति छिपी है जिसने उसे इतना बडा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्विजीवियो के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है यही प्रश्र के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एंव आद्य सरसंघचालक डॉ केशवबलिराम हेडगेवार के विचारो को उचित परिप्रेक्ष्य मे समक्षना होगा क्योकि उन्होने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया । वास्तव में डॉ हेडगेवार के संदेशो में ही छिपा है आरएसएस के शक्शिली और विस्तारित हाने का रहस्य। डा0 हेडगेवार ने 13 अक्टूबर 1937 को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उदेश्य के निरूपति करते हुए का था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्वार के लिए ही किया गया है सघ का कोई दूसरा -तीसरा उदेश्य न होकर केवल स्वयं का उदार करना यही उसकी इच्छा है परन्तु स्वयं का उदार कैसे होगा पहले हमे इस पर विचार करना होगा स्वयं का उदार करने के लिए जीवित रहना पड़ता है जो समाज जीवित रहेगा वही समाज स्वयं का और अन्यो ा उछार कर सकता है और संघ की स्थापना इसी के लिए हुआ है हिन्दू समाज जीवित रहे अथवा इस तत्व के अनुसार जीवित रहने योग्य रहे इस उदेश्य से ही संघ का जन्म हुआ है। डा0 हेडगेवार के इस आवान को स्वीकार कर अनेको ने संघ कार्य के लए अपने जीवन को सामर्पित किया जिनमे श्रीगुरूजी गोलवलवर बाजासाहब देवरस एकाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ, बाबासाहेब आपटे तथा माधवराव मुले/आदि महानुभाव प्रमुख थे। इन सभी के अनथक प्रयत्रो से संघ संख्यात्मक मुणात्मक और संगठनात्मक दृष्टि से बढता ही जाता है। संघ के संगठन संरचना मे अधिकारी के निर्देश का स्वयंसेवकों द्वारा अक्षरशः पालन करने की अदभुत अनुशासित परम्परा है। संघ के प्रचारक राष्ट्र पुनरूत्थान के संकल्प को जीते है और अपने आचरण व व्यवहार से अपने सम्पर्क में आनेवाले लोगो के राष्ट्रोत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा देते है राष्ट्र को समर्पित प्रचारको व स्वयंसेवको के व्यवहार और चरित्र के बल पर संघ आज देश के प्रत्येक क्षेत्र कार्यरत है उल्लेखनीय है कि विश्व के अन्य देशो मे भी संघ का कार्य चलता है पर सह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नही चलता। कही पर भारतीय स्वयंसेवक संघ तो कही हिन्दू स्वयंसेवक संघ के रूप में संघ का कार्य चलता है। संघ मे संगठनात्मक संरचना में सरसंघचालक का स्थान सर्वोपरि है जो पूरे संघ्ज्ञ की कार्य योजनाओ को दिशा प्रदान करते है। सरसंघचालक की नियुक्ति पूर्व सरसंघचालक के मनोनय से होती है प्रत्येक सरघंचालक के नाम की घोषणा करते है। संघ के संस्थापक डाक्टर केशराव अलिराम हेडगेवार उपाख्य डाक्टरजी ( 1925-1940) ने माधव सदाशिववराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी (1940-1973) को नियुक्त किया था तत्पश्यात श्रीगुरूजी ने चिट्ठी लिखकर मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाध्याय बाला साहेब देवरस (1973-1993) को अगले सरसंघचालक होने की बात कही थी इसके बाद बालासाहेब देवरस ने प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया (1993-2000) को नियुक्त किया और रज्जू ीया ने कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य सुदर्शनजी (2000-2009) के नाम की घोषण की सुदर्शनजी ने 2009 मे डा मोहनराव मधुकराव भागवत को सरसंघचालक का दायित्व सौपा है।
सन्दर्भ
(1) आर्म्ड स्ट्रगल फॉर फ्रीडम- बी.एस.हरदास पृष्ठ 372
(2) यथोपरि पृष्ठ 374
(3) दि डायरेक्टर क्रिमिनल इटेलिजेंस, जनवरी 1944 पृष्ठ 97 इंडिया हाउस लन्दन और समाचार-पत्र ‘केसरी‘ 5 जुलाई, 1914 पृष्ठ 5 और गोविंद गणेश आवडे, महाराष्ट्र,28 जुलाई 1940 पृष्ठ 12
(4) पोलिटिकल क्रिमिनल हूॅज हूॅ पृष्ठ 97
(5) फाइल क्रमांक 26-41 गृह राजनीतिक भाग जून 1910 राष्ट्रीय अमिलेखागार नई दिल्ली (6) चक्रवर्ती, थर्टी ईयर्स इन प्रिजन पृष्ठ 277-78 अल्फाबीटा प्रकाशन कोलकाता 1963 (7) जोगेश चन्द्र चटर्जी, इन सच्र आफ फ्रीडम, पृष्ठ 27
(8) अतुल्य रत्न घोष, मॉडर्न रिव्यू, मार्च 1941
(9) बी.एस. शास्त्री हरदास आर्म्ड स्ट्रगल फार फ्रीडम पृष्ठ 373
(10) जी.वी. केतकर रनझुनकर पी.सी. खान खोजे यॉचा चरित्र पृष्ठ 12
(11) हितवाद, 12 फरवरी 1916 पृष्ठ 7
(12) हितवाद, 29 जनवरी 1981 पृष्ठ 7
(13) बालाजी हुद्दार, दि आरएसएस एण्ड नेताजी दि इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इण्डिया 7-13, अक्टूबर 1979 पृष्ठ 23
(14) केसरी, 25 जून 1940
(15) महाराष्ट्र 2 फरवरी 1921 पृष्ठ 7
(16) महाराष्ट्र 20 अप्रैल 1921 पृष्ठ 7
(17) फाइल नम्बर 28/192/ राजनीतिक भाग 1 पैरा 17 राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली (18) पूर्वोक्त
(19) फाइल 88/33 गृह राजनीतिक राष्ट्रीय आमिलेखागार नई दिल्ली
(20) पूर्वोक्त पृष्ठ 3-4
(21) केसरी, 5 जनवरी 1936
(22) एच एम घोडे के, रिवोल्यूशनरी नेशनलिज्म इन वेरटर्न इण्डिया, पृष्ठ 173-174 (23) फाइल संख्या 28/08/42 गृह विभाग
(1)राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली
(24) केशव स्मारामि सदा, खण्ड(1) हफ 11-12 सुरूचि साहित्य ।
ई-मेल: kautilyakabharat@gmail.com
राजेन्द्र नाथ तिवारी
अध्यक्ष- पूर्वांचल विद्वत परिषत्, बस्ती
सम्पादक- प्रकाशक-लोक साक्षी दैनिक
कौटिल्य का भारत दैनिक समाचार-पत्र
प्रज्ञा -प्रकाशन, न्याय मार्ग, बस्ती उत्तर प्रदेश
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आज़ादी के पूर्व से आजतक एक जीवंत संगठन की जानकारी ठीक से दी गयी जिन्हें जनता अभी भी हाफ पैंट धारी मानते हुए हल्के में लेती है ।इसे पढ़ कर अपनी धारणा बदलें ।
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